आयुर्वेद: ‘आयु’ और ‘वेद’ का संगम, भारतीय चिकित्सा का प्राचीन ज्ञान।

आयुर्वेद: ‘आयु’ और ‘वेद’ का संगम, भारतीय चिकित्सा का प्राचीन ज्ञान।
लखनऊ।क्षेत्रीय आयुर्वेदीय अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में आयोजित त्रैमासिक राजभाषा हिंदी कार्यशाला में आयुर्वेद को लेकर एक महत्वपूर्ण चर्चा हुई। इस अवसर पर, लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हेमांशु सेन ने आयुर्वेद के गहरे आयामों को स्पष्ट करते हुए कहा कि आयुर्वेद शब्द का संधि-विच्छेद हमें इसके मूल तत्वों की गहरी समझ प्रदान करता है।
“आयु” का अर्थ है जीवन और “वेद” का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार आयुर्वेद का अर्थ हुआ ‘जीवन का ज्ञान’ या ‘जीवन की विद्या’, जो हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संतुलन को बनाए रखने के लिए प्राचीन

समय से अनुसंधान और अनुभव पर आधारित है। आयुर्वेद न केवल बीमारी का इलाज करता है, बल्कि यह एक समग्र जीवनशैली को अपनाने की कला है, जिससे व्यक्ति का सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सुख-शांति सुनिश्चित होती है।
कार्यशाला में प्रोफेसर हेमांशु सेन ने आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में निहित ज्ञान को वैश्विक दृष्टिकोण से देखा और बताया कि आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धतियों ने आज भी दुनियाभर में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। उन्होंने यह भी कहा कि आयुर्वेद में ऋतु, आहार, और खुराक की विशेषता को ध्यान में रखते हुए रोगों का उपचार किया जाता है।
इस दौरान डॉ. कांबले पल्लवी नामदेव ने संस्थान में हिंदी में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी, जबकि प्रभारी सहायक निदेशक डॉ. संजय कुमार सिंह ने कार्यशाला के समापन पर सभी का आभार व्यक्त किया।
कार्यशाला के अंत में हेमंत शुक्ला ने आयुर्वेद के महत्व को पुनः दोहराते हुए कहा कि आयुर्वेद एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जो न केवल रोगों का इलाज करती है, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को बनाए रखते हुए जीवन को सुखमय बनाती है। आयुर्वेद का ज्ञान आज भी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का आधार बना हुआ है, और इसकी प्रासंगिकता न केवल हमारे देश, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बढ़ रही है।
इस तरह की कार्यशालाएं न केवल आयुर्वेद के महत्व को समझने का अवसर प्रदान करती हैं, बल्कि यह भी याद दिलाती हैं कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान धारा कितनी समृद्ध है।
UDAY RAJ
SENIOR JOURNALIST



