
भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव का अलर्ट: “किसानों, नौजवानों और छोटे कारोबारियों की कुर्बानी नहीं होनी चाहिए”
नीचे अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर विपक्ष के वरिष्ठ नेता व सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बयान पर बिना कॉपी किया हुआ, मौलिक और प्रभावशाली 1000 शब्दों के आसपास का समाचार प्रस्तुत है—हैडिंग और सब-हैडिंग के साथ:
नई दिल्ली/लखनऊ:भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित/ताज़ा हुई ट्रेड डील को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस समझौते पर सरकार से सीधी और सख्त सवाल-जवाब की मांग की है। उनका कहना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते का सीधा असर देश के किसानों, छोटे कारोबारियों, एमएसएमई सेक्टर और आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। ऐसे में सरकार को “गोपनीयता” नहीं, बल्कि “पारदर्शिता” अपनानी चाहिए।
“राष्ट्रहित पहले, जल्दबाज़ी में समझौता नहीं”
अखिलेश यादव ने कहा कि भारत जैसे विशाल उपभोक्ता बाज़ार वाले देश के लिए ट्रेड डील केवल आयात-निर्यात का आंकड़ा नहीं होती, बल्कि यह रोजगार, कीमतों और घरेलू उद्योग की सेहत से जुड़ा मसला है। उनके मुताबिक, अगर समझौते की शर्तें घरेलू उत्पादन को नुकसान पहुंचाती हैं, तो इसका खामियाजा किसानों और कारीगरों को भुगतना पड़ेगा।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि समझौते की शर्तें संसद के सामने रखी जाएं ताकि सभी दलों की राय लेकर ही अंतिम फैसला हो।
किसानों की चिंता: कृषि आयात से दबाव का खतरा
सपा प्रमुख ने कृषि क्षेत्र को लेकर आशंका जताई कि यदि डील के तहत सस्ते आयात को बढ़ावा मिला, तो घरेलू किसानों की उपज को उचित दाम नहीं मिल पाएगा। उन्होंने कहा कि भारत में लागत अधिक है—बीज, खाद, सिंचाई और परिवहन—ऐसे में विकसित देशों के सब्सिडी-समर्थित कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में आएंगे तो प्रतिस्पर्धा असमान हो जाएगी।
अखिलेश यादव ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की मजबूती और किसानों के हित में सुरक्षा प्रावधानों को डील का अनिवार्य हिस्सा बनाने की मांग की।
एमएसएमई और स्टार्टअप पर असर: ‘बड़े खिलाड़ी छोटे कारोबार निगल न लें’
उन्होंने एमएसएमई सेक्टर को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अधिक रियायतें देने से घरेलू छोटे उद्योग दबाव में आ सकते हैं। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और निवेश स्वागतयोग्य है, लेकिन शर्तें ऐसी हों कि भारतीय उद्यमी प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।
उनका कहना था कि सरकार को लोकल सप्लाई चेन मजबूत करने, सस्ते कर्ज और स्किल डेवलपमेंट के जरिए एमएसएमई को पहले सशक्त बनाना चाहिए—तभी खुली प्रतिस्पर्धा में उतरना समझदारी होगी।
दवाइयों और हेल्थ सेक्टर पर सवाल
अखिलेश यादव ने फार्मा और हेल्थ सेक्टर के संदर्भ में कहा कि पेटेंट नियमों में किसी भी तरह की सख्ती से सस्ती जेनेरिक दवाइयों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। भारत “दुनिया की फार्मेसी” के रूप में जाना जाता है; अगर ट्रेड डील में ऐसे प्रावधान आए जो दवाइयों की कीमत बढ़ाएं, तो आम आदमी की सेहत पर सीधा असर पड़ेगा।
उन्होंने सरकार से स्पष्ट करने को कहा कि मरीजों के हित सर्वोपरि रहेंगे और दवा कंपनियों के मुनाफे के लिए जनहित से समझौता नहीं होगा।
डेटा, डिजिटल व्यापार और स्थानीय कंपनियां
डिजिटल व्यापार और डेटा लोकलाइजेशन पर भी सपा प्रमुख ने चिंता जताई। उनका कहना है कि भारतीय उपभोक्ताओं का डेटा देश की संपत्ति है। यदि डील के तहत डेटा से जुड़े नियम ढीले किए गए, तो देश की डिजिटल संप्रभुता कमजोर पड़ सकती है।
उन्होंने स्टार्टअप इकोसिस्टम को संरक्षण देने की बात कही ताकि वैश्विक दिग्गज कंपनियों के सामने भारतीय कंपनियां दब न जाएं।
रोज़गार और कीमतों पर प्रभाव
अखिलेश यादव के अनुसार किसी भी ट्रेड डील का अंतिम पैमाना यह होना चाहिए कि उससे रोजगार बढ़ता है या घटता। यदि आयात बढ़ा और घरेलू उत्पादन प्रभावित हुआ, तो नौकरियों पर संकट आएगा। वहीं, कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा से कीमतें घट सकती हैं—लेकिन इसका लाभ तभी टिकाऊ होगा जब स्थानीय उद्योग बंद न हों।
उन्होंने सरकार से सेक्टर-वाइज प्रभाव आकलन रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की।
“संसद में बहस हो, राज्यों से सलाह ली जाए”
सपा प्रमुख ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों का असर राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है—कृषि, हस्तशिल्प, डेयरी, टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में राज्य सरकारों की भूमिका अहम है। इसलिए अंतिम समझौते से पहले राज्यों से परामर्श और संसद में व्यापक बहस जरूरी है।
उनका तर्क है कि संघीय ढांचे में राज्यों की आवाज़ अनसुनी नहीं होनी चाहिए।
सरकार का पक्ष और सियासी बहस
सरकार समर्थक खेमे का कहना है कि ट्रेड डील से निवेश, तकनीक और बाज़ार तक पहुंच बढ़ेगी। इसके जरिए निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा और कुछ क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर बनेंगे।
इस पर अखिलेश यादव ने जवाब दिया कि लाभ तभी सार्थक होगा जब सुरक्षा प्रावधान मजबूत हों और घरेलू उद्योगों को तैयारी का समय मिले। “सिर्फ निवेश के आंकड़े दिखाकर देशहित का दावा करना पर्याप्त नहीं,” उन्होंने कहा।
संतुलन ही समाधान
कुल मिलाकर, अखिलेश यादव का रुख किसी भी विदेशी साझेदारी के खिलाफ नहीं, बल्कि संतुलित, पारदर्शी और जनहितकारी समझौते के पक्ष में है। उनका जोर इस बात पर है कि भारत अपनी सौदेबाजी की ताकत का इस्तेमाल करे, किसानों–एमएसएमई–मरीजों–डिजिटल उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित रखे और संसद के माध्यम से जनता के सामने पूरा सच रखे।
ट्रेड डील से अवसर जरूर बन सकते हैं, लेकिन बिना सुरक्षा कवच के खुले बाज़ार में कूदना जोखिम भरा हो सकता है—यही संदेश अखिलेश यादव के बयान का मूल भाव है।



