राजनीति

संसद में 8 सांसदों के निलंबन पर चिराग पासवान का तीखा हमला।

संसद में 8 सांसदों के निलंबन पर चिराग पासवान का तीखा हमला।

“हंगामे से राजनीति चमकती नहीं, लोकतंत्र कमजोर पड़ता है” — केंद्रीय मंत्री का बड़ा बयान

नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के दौरान विपक्षी हंगामे के बाद 8 सांसदों के निलंबन का मामला देश की राजनीति में नई बहस छेड़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने विपक्ष पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि कुछ नेताओं को सदन का कामकाज रुकने में ही संतोष मिलता है। उनका आरोप है कि व्यवधान और शोर-शराबा अब राजनीति का हथियार बनता जा रहा है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर असर पड़ रहा है।

बजट सत्र और विवाद की पृष्ठभूमि

बजट सत्र को संसद का सबसे महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है क्योंकि इसी दौरान सरकार अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं रखती है और विपक्ष उन पर सवाल खड़े करता है। इस बार भी सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी नोकझोंक देखने को मिली। सदन की कार्यवाही के दौरान बार-बार व्यवधान, नारेबाजी और नियमों की अवहेलना के आरोप सामने आए।

स्पीकर की ओर से बार-बार संयम बरतने और निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने की अपील की गई, लेकिन हंगामे का दौर थम नहीं पाया। अंततः अनुशासनहीनता के आरोपों के तहत 8 सांसदों को शेष सत्र के लिए निलंबित करने का निर्णय लिया गया। यह फैसला सामने आते ही राजनीतिक तापमान और बढ़ गया।

निलंबन की कार्रवाई: नियमों का पालन या कठोरता?

संसदीय परंपरा में निलंबन को आखिरी विकल्प माना जाता है। आम तौर पर यह कदम तब उठाया जाता है जब किसी सदस्य का आचरण बार-बार चेतावनी के बावजूद सदन की गरिमा के अनुरूप न हो। सत्ता पक्ष का तर्क है कि कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए अनुशासन जरूरी है और नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई अपरिहार्य हो जाती है।

विपक्ष का कहना है कि उन्हें बोलने का अवसर पर्याप्त नहीं मिला, इसलिए विरोध दर्ज कराने के लिए कड़े कदम उठाने पड़े। उनके मुताबिक निलंबन लोकतांत्रिक असहमति को दबाने जैसा है। इस टकराव ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सदन में विरोध की सीमा क्या होनी चाहिए और अनुशासन बनाए रखने की प्रक्रिया कितनी संतुलित हो।

चिराग पासवान का बयान: “सदन बाधित करना आदत बन गई है”

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने इस पूरे प्रकरण पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संसद बहस और समाधान का मंच है, न कि स्थायी हंगामे का। उनके अनुसार, कुछ नेता हर सत्र में नए बहाने ढूंढते हैं ताकि कार्यवाही बाधित हो और मुद्दों पर गंभीर चर्चा न हो सके।

चिराग ने यह भी कहा कि स्पीकर के निर्देशों का सम्मान करना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन उसे व्यक्त करने के तरीके भी लोकतांत्रिक होने चाहिए। “अगर सदन चलेगा नहीं, तो जनता के सवालों पर जवाबदेही कैसे तय होगी?” — उनके इस सवाल ने बहस को नया आयाम दे दिया।

लोकतांत्रिक मर्यादा बनाम सियासी रणनीति

संसद में विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन विरोध की भाषा और तरीका यदि मर्यादा तोड़ने लगे, तो संस्थागत विश्वास कमजोर होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बार-बार व्यवधान से न केवल विधायी काम प्रभावित होता है, बल्कि जनता में यह संदेश भी जाता है कि उनके प्रतिनिधि समाधान से ज्यादा टकराव में रुचि रखते हैं।

कुछ विशेषज्ञ इसे विपक्ष की रणनीति मानते हैं—जब सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त समय या मंच न मिले, तो दबाव बनाने के लिए हंगामे का रास्ता अपनाया जाता है। वहीं, सत्ता पक्ष पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वह असहज सवालों से बचने के लिए नियमों का कड़ाई से इस्तेमाल करता है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।

जनता के मुद्दे पीछे क्यों छूट जाते हैं?

बजट सत्र के दौरान देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम विषयों पर चर्चा अपेक्षित होती है। लेकिन बार-बार कार्यवाही स्थगित होने से इन मुद्दों पर गहन बहस नहीं हो पाती। इससे न केवल नीतिगत फैसलों में देरी होती है, बल्कि जनता की उम्मीदें भी टूटती हैं।

चिराग पासवान ने इस संदर्भ में कहा कि संसद का हर मिनट जनता के पैसे से चलता है। यदि वह समय शोर-शराबे में जाया होगा, तो असल नुकसान आम नागरिक का होगा। उन्होंने आग्रह किया कि सभी दल अपनी राजनीतिक असहमति को सार्थक बहस में बदलें ताकि ठोस समाधान निकल सके।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक तल्खी

निलंबन के बाद विपक्षी दलों ने इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला” करार दिया। उनका कहना है कि सरकार बहस से बच रही है और सख्त कदम उठाकर विरोध की आवाज दबा रही है। विपक्ष ने मांग की कि निलंबन पर पुनर्विचार हो और सदन में संवाद का माहौल बनाया जाए।

इस बीच सत्ता पक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि सदन को बंधक बनाना लोकतंत्र नहीं है। उनके अनुसार, यदि हर असहमति का जवाब हंगामा होगा, तो विधायी प्रक्रिया कैसे चलेगी? दोनों ओर से बयानबाजी तेज है और सियासी खींचतान और गहराती दिख रही है।

संसदीय परंपराएं और संतुलन की जरूरत

भारत की संसदीय व्यवस्था संवाद और सहमति की परंपरा पर टिकी रही है। समय-समय पर मतभेद रहे हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में नियमों के भीतर रहकर समाधान निकाले गए हैं। मौजूदा विवाद इस बात की याद दिलाता है कि विरोध और अनुशासन के बीच संतुलन कितना जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्पीकर की भूमिका निष्पक्ष मध्यस्थ की होनी चाहिए और विपक्ष को भी अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, सदस्यों को यह भी समझना होगा कि व्यक्तिगत या दलगत रणनीति से ऊपर राष्ट्रहित है।

आगे की राह: टकराव से संवाद की ओर

इस पूरे घटनाक्रम से निकलने का रास्ता टकराव नहीं, संवाद है। सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष की चिंताओं को गंभीरता से सुने और बहस के लिए पर्याप्त समय दे। विपक्ष को भी चाहिए कि वह विरोध के लोकतांत्रिक तरीकों को अपनाए और सदन की कार्यवाही को बाधित करने से बचे।

यदि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझें, तो संसद फिर से जनहित के मुद्दों पर ठोस फैसले लेने का मंच बन सकती है। लोकतंत्र की मजबूती शोर से नहीं, संवाद और सहमति से आती है।

8 सांसदों के निलंबन पर चिराग पासवान का बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संसदीय आचरण पर गंभीर टिप्पणी है। यह घटना बताती है कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं। यदि संसद में बहस का स्तर गिरता रहा और हंगामा बढ़ता गया, तो नुकसान केवल किसी दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र का होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें और संसद को फिर से सार्थक संवाद का केंद्र बनाएं—यही लोकतंत्र के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी।

 

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