
भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर: आखिर क्यों सवालों के घेरे में आई पुलिस? जानिए पूरे मामले की परतें
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ पुलिस की सख्त कार्रवाई और एनकाउंटर की घटनाएं अक्सर चर्चा का विषय बनती रही हैं। इसी कड़ी में भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर ने भी प्रदेश की राजनीति, कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। जहां पुलिस इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बता रही है, वहीं मृतक के परिजन और कुछ सामाजिक संगठनों ने इस एनकाउंटर पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मामले को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग भी तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस के अनुसार भरत भूषण तिवारी कई गंभीर आपराधिक मामलों में वांछित था। उस पर हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी और अन्य संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज थे। पुलिस लंबे समय से उसकी तलाश कर रही थी। सूचना मिलने पर पुलिस टीम ने उसे पकड़ने के लिए अभियान चलाया।
बताया गया कि पुलिस ने जब उसे घेरने की कोशिश की तो उसने कथित तौर पर पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की, जिसमें भरत भूषण तिवारी गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
पुलिस के दावों पर उठे सवाल
एनकाउंटर के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या वास्तव में भरत भूषण तिवारी ने पहले पुलिस पर गोली चलाई थी या फिर यह एक पूर्व नियोजित कार्रवाई थी। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने पहले उसे हिरासत में लिया और बाद में एनकाउंटर की कहानी तैयार कर दी।
परिवार का कहना है कि यदि वह वांछित था तो उसे कानून के तहत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जाना चाहिए था। उनका आरोप है कि पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
परिजनों ने लगाए गंभीर आरोप
भरत भूषण तिवारी के परिजनों का कहना है कि उन्हें घटना की जानकारी समय पर नहीं दी गई। उनका दावा है कि पुलिस की ओर से पूरे घटनाक्रम को लेकर स्पष्ट जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई गई।
परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि एनकाउंटर से पहले भरत भूषण तिवारी पुलिस के संपर्क में था और उसे जिंदा गिरफ्तार किया जा सकता था। उनका कहना है कि मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।
विपक्ष ने भी उठाए सवाल
घटना के बाद विपक्षी दलों ने भी सरकार और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन कानून के शासन में हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
विपक्षी नेताओं ने मांग की कि यदि पुलिस का दावा सही है तो पूरे घटनाक्रम के सभी साक्ष्य सार्वजनिक किए जाएं, जिससे किसी प्रकार का संदेह न रहे।
पुलिस ने दिया अपना पक्ष
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूरी कार्रवाई कानून के दायरे में की गई। अधिकारियों के मुताबिक पुलिस टीम पर पहले फायरिंग की गई थी, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी।
पुलिस का दावा है कि घटनास्थल से हथियार, कारतूस और अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद की गई है। साथ ही यह भी कहा गया कि पूरे मामले की नियमानुसार मजिस्ट्रियल जांच और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं।
एनकाउंटर के बाद क्यों बढ़ा विवाद?
इस मामले में विवाद इसलिए भी बढ़ा क्योंकि सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे और वीडियो सामने आए। कुछ लोगों ने पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया, जबकि कुछ ने इसे संदिग्ध बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की।
हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सभी जानकारियों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पुलिस और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
कानूनी प्रक्रिया क्या कहती है?
भारत में किसी भी पुलिस एनकाउंटर के बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है। इसमें घटनास्थल का निरीक्षण, फॉरेंसिक जांच, पोस्टमार्टम, स्वतंत्र जांच, मजिस्ट्रियल जांच तथा संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट भेजना शामिल है।
यदि किसी पक्ष को पुलिस कार्रवाई पर संदेह हो तो वह न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकता है। ऐसे मामलों में अदालत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करती है।
मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया
कुछ मानवाधिकार संगठनों ने भी इस घटना पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, हर व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार है। इसलिए पूरे मामले की पारदर्शी जांच होना आवश्यक है।
वहीं कई लोगों का मानना है कि यदि कोई अपराधी पुलिस पर गोली चलाता है तो पुलिस को आत्मरक्षा का अधिकार भी प्राप्त है। ऐसे में वास्तविक स्थिति का पता जांच पूरी होने के बाद ही चल सकेगा।
जांच के बाद ही साफ होगी तस्वीर
भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर फिलहाल कई सवालों के बीच घिरा हुआ है। एक ओर पुलिस इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बता रही है, तो दूसरी ओर परिजन और कुछ संगठन इस पर गंभीर आपत्ति जता रहे हैं। ऐसे में यह मामला अब जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
जब तक मजिस्ट्रियल जांच, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य आधिकारिक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। फिलहाल पूरे प्रदेश की नजर इस मामले की जांच और उसके परिणाम पर टिकी हुई है, क्योंकि इससे न केवल इस एनकाउंटर की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब भी मिल सकेंगे।


