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कहानियों का शहर और किस्सों का हुनर: हिमांशु बाजपेयी।

कहानियों का शहर और किस्सों का हुनर: हिमांशु बाजपेयी।

लखनऊ की गलियों से दास्तानगोई के मंच तक

अगर लखनऊ की गलियों, उसकी तहज़ीब और उसके इतिहास को किसी ने ज़िंदा रखा है तो वह हैं हिमांशु बाजपेयी। वे सिर्फ़ एक लेखक या पत्रकार नहीं, बल्कि एक ऐसे दास्तानगो हैं जो अतीत और वर्तमान के बीच सेतु बनकर कहानियों को जीवंत कर देते हैं। उनकी आवाज़, उनका लहजा और उनकी भाषा सुनने वाले को सीधे उस दौर में ले जाती है जहाँ किस्से सिर्फ़ सुने नहीं जाते थे, बल्कि जीए जाते थे।

लखनऊ की रूह को शब्दों में पिरोना

हिमांशु लखनऊ के उन साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने शहर की रूह को अपनी कलम और ज़बान दोनों से सँजोया है। उनकी दास्तानगोई में मजाज़ लखनवी की शायरी, अमीर खुसरो के गीत, अब्दुल रहीम खानेखाना की सूझ और पुराने लखनऊ की गलियों का रंग घुला होता है।
वे त्योहारों की रौनक, चौक की रौनक, इमामबाड़ों की भीड़ या लखनऊ के मशहूर आमों पर भी ऐसे किस्से कहते हैं कि श्रोता खुद को उसी माहौल में महसूस करने लगता है।

दास्तानगोई: एक पुरानी कला का नया रूप

दास्तानगोई यानी किस्सों को सुनाने की वह मध्यकालीन उर्दू कला, जिसमें कथाकार अपनी आवाज़, अदायगी और शब्दों से पूरी दुनिया रच देता है। एक दौर था जब यह कला गुमनामी में जा रही थी, लेकिन हिमांशु बाजपेयी जैसे कलाकारों ने इसे नए समय में फिर से जीवंत किया।
उनकी दास्तानें सिर्फ़ मनोरंजन भर नहीं होतीं, बल्कि उनमें इतिहास, संस्कृति और संवेदनाओं की गहरी परतें भी होती हैं। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियों में युवा से लेकर बुजुर्ग तक सबकी दिलचस्पी बनी रहती है।

शिक्षा और शोध: नवल किशोर प्रेस की विरासत

हिमांशु की शैक्षणिक यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं है। उन्होंने पीएचडी की है और उनकी थीसिस भारत के सबसे बड़े और ऐतिहासिक प्रिंटिंग प्रेस नवल किशोर प्रेस पर आधारित रही।
यह वही प्रेस था जिसने 19वीं और 20वीं सदी में हिंदी और उर्दू साहित्य की कई क्लासिक कृतियाँ प्रकाशित कीं। उनकी रिसर्च यह साबित करती है कि भारतीय समाज में प्रिंटिंग प्रेस का कितना गहरा सांस्कृतिक असर पड़ा।

किताबें और साहित्यिक योगदान

हिमांशु की पहली किताब “क़िस्सा क़िस्सा लखनऊवा” राजकमल प्रकाशन से आई और देखते ही देखते बेस्टसेलर बन गई। इसमें पुराने लखनऊ के आम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी, उनकी छोटी-छोटी खुशियाँ, दुख और मज़ेदार किस्सों को बहुत आत्मीयता से लिखा गया है।
इस किताब ने न सिर्फ़ साहित्यिक हलकों में सराहना बटोरी, बल्कि नए पाठकों को भी उर्दू-हिंदी साहित्य की ओर आकर्षित किया।

चलते-फिरते शायरी और किस्सों का खज़ाना

हिमांशु को लोग अक्सर “चलते-फिरते शायरी का खज़ाना” कहते हैं। उनके पास उर्दू और हिंदी की सैकड़ों ग़ज़लें, कविताएँ और गीत याद हैं।
वे जब मंच पर आते हैं तो किसी किस्से के साथ-साथ शेरो-शायरी का ऐसा रंग बिखेरते हैं कि महफ़िल ज़िंदा हो जाती है। यही वजह है कि उनकी प्रस्तुतियों में साहित्यिक स्वाद और भावनात्मक जुड़ाव, दोनों का मेल देखने को मिलता है।

क्यों ज़रूरी हैं हिमांशु बाजपेयी?

आज जब तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में लोग कहानियों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में हिमांशु जैसे कलाकार हमें यह याद दिलाते हैं कि कहानियाँ ही किसी शहर और समाज की आत्मा होती हैं।
लखनऊ की तहज़ीब, उसकी गंगा-जमुनी संस्कृति और उसका अदब अगर अब भी ज़िंदा है, तो उसमें हिमांशु बाजपेयी का योगदान अहम है।

हिमांशु बाजपेयी सिर्फ़ एक दास्तानगो नहीं, बल्कि लखनऊ की तहज़ीब और किस्सागोई की विरासत के वाहक हैं। वे उस रिवायत को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें शहर, लोग और उनकी ज़िंदगी हमेशा कहानियों के रूप में अमर हो जाते हैं।

 

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